20 जनवरी, 2026

घड़ी

  घड़ी सिर्फ़ समय नहीं बताती,

वह चेतावनी भी देती है।

आंखें दिखाती है,

बार-बार,

बिना चिल्लाए ।

मगर हम हैं कि

करवट बदल लेते हैं 

जैसे समय

गलत बिस्तर पर आ गया हो।

और अगर घड़ी बंद पड़ जाए,

तो फ़ौरन कह देते हैं,

“ख़राब हो गई है।”

बैटरी ?-

वह तो

किसी और को लगानी चाहिए।

सूइयां ?

वे भी

अपनी जगह खुद

ढूंढ़ लें तो बेहतर।

घड़ी बोलती रहती है,

लगातार,

ईमानदारी से।

 हम उसे अनसुना करते जाते हैं,

फिर शिकायत करते हैं

“वक़्त ठीक नहीं चल रहा।”

आख़िर में

दोष वही पुराना

बेचारी घड़ी का ।








18 अगस्त, 2025

गंगा

गंगा !

तुम परंपरा से बंधकर बहती, 

स्त्री तो हो

किंतु परंपरा से अलग जाकर 

अबला अर्थ नहीं वहन करती 

वो रुपवती धारा हो

जिसका वेग 

कभी लुप्त नहीं होता ।

हां, किनारों का साथ पाकर

तुम ठहर जरुर जाती हो,

पर वह ठहराव,

तुम्हारे भीतर बहते सत्य को

कम नहीं करता।

शिव ने तुम्हें अपनी जटाओं में बांधा,

तुमने स्वयं को संयमित किया 

पर जब त्रिनेत्र खुला,

 तांडव की लय फूटी,

तब तुम्हारा प्रचंड प्रवाह

किसी के वश में नहीं रहा।

तुम मेरे भीतर की वही शक्ति हो

जो धैर्य रखती है,

पर समय आने पर

अपने सम्पूर्ण रूप में

सब कुछ बहा ले जाने की क्षमता से अनभिज्ञ नहीं रहती ।


रश्मि प्रभा

16 मई, 2025

जो गरजते हैं वे बरसते नहीं

 कितनी आसानी से हम कहते हैं 

कि जो गरजते हैं वे बरसते नहीं ..."

बिना बरसे ये बादल 

अपने मन में उमड़ते घुमड़ते भावों को लेकर 

आखिर कहां!

किस हाल में होते हैं ?

यह न हमने सोचा,

न जानने की कोशिश की,

हम तो बस इस बात से खुश रहे

कि हमने कितनी सही बात कह दी ।

उन्हीं बिन बरसे बादलों की तरह 

हम किसी के दर्द,

किसी की मनःस्थिति से अलग

सिर्फ़ अपनी कही बातों की जीत पर 

इतराते हैं 

लोगों के बीच सीना तानकर 

विजयी मुस्कान लिए कहते हैं 

'हमने तो पहले ही कहा था'

मगर जो कभी 

ये बिन बरसे उजबुजाए बादल

बरस गए 

तो भी हमारी शान नहीं घटती,

हम मुंह बिचकाकर,

कंधों को उचकाकर कहते हैं,

"क्या फ़र्क पड़ता है,

कुछ देर बरसेंगे फिर गायब" ...

कुछ देर को ही सही 

उनके बरस जाने से फैली 

 सौंधी गंध के लिए हम

उनके शुक्रगुज़ार नहीं होते

शुष्क चट्टान की तरह 

अपने चोचलों में मग्न रहते हैं 

इस बात से बेखबर,

उदासीन 

कि किसी रोज़ बिना गरजे

यही छोटे छोटे बादल बरसकर 

हमारे अस्तित्व को क्षीण कर 

हमें हीन कर सकते हैं !

इसके लिए हमें सतर्क रहना होगा 

जागते रहना होगा 

समझना होगा ...


रश्मि प्रभा

06 जनवरी, 2025

ख्वाबों का कुंभ

 ख्वाबों का कुंभ क्या लगा

मेरे सारे ख्वाब मचल उठे

हमें भी डुबकी लगानी है ।

मैंने कहा भी,

बड़ी भीड़ होगी ख्वाबों की

कहीं तुम गुम न हो जाओ,

या फिर 

किसी मझदार में न फंस जाओ ...

ख्वाब खिलखिला उठे,

ख्वाबों का कुंभ है,

किसकी बिसात है

जो हमें खत्म कर दे

तुम हो तो हम हैं

हम हैं तो तुम

चलो, एक डुबकी लगा लेते हैं ।



रश्मि प्रभा

02 जनवरी, 2025

आ अब लौट चलें

 नया साल, नया संकल्प, एक सकारात्मक क़दम । शुभकामनाओं के साथ लाई हूं वही पुराना अनुरोध - चलो, फिर से पूरे जोश के साथ ब्लॉगिंग शुरू करते हैं । कुछ ब्लॉगर अभी भी नियमित हैं, कुछ को अपने ही ब्लॉग पर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, मैं नियमित नहीं, पर हूं । नियमित का मतलब है, लिखिए और औरों को पढ़िए ।यह बहुत कम होता है, तो यह सही नहीं है न । एक पुराना आत्मीय संपर्क कम हो गया है । आइए लौट चलें,

























09 नवंबर, 2024

एहसास

 मैंने महसूस किया है 

कि तुम देख रहे हो मुझे 

अपनी जगह से ।

खासकर तब,

जब मेरे मन के कुरुक्षेत्र में 

मेरा ही मन

कौरव और पांडव बनकर खड़ा रहता है !

मेरे मन‌ की द्रौपदी को 

मेरा ही मन 

दु:शासन बना घसीटता है 

आहत होकर भी पितामह मन

कुछ नहीं कहता 

और कर्ण की तरह दान देता मन

दानवीरता, मित्रता, कर्तव्य निभाने में 

कहीं कमज़ोर हो जाता है 

कहीं ग़लत !!!

केशव,

तुम हर बार आकर 

मेरे अदृश्य सारथी बनकर

सखा बनकर

गुरु बनकर

मुझे गीता सुनाते हो !

उस गीता ने ही 

मुझे तुम्हारे दर्द को समझने की क्षमता दी है।

हां केशव,

दर्द को सहने की क्षमता जिसमें हो,

वही कहता है,

तुम्हारा क्या गया जो रोते हो !"

वही मानता है,

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन !"

वही अराजकता के अंध कूप से 

यह उद्घोष करता है,

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌  ।


रश्मि प्रभा

18 सितंबर, 2024

बुनियाद

 जो रिश्ता रिश्तों के नाम पर

एक धारदार चाकू रहा,

उसे समाज के नाम पर

रिश्तों का हवाला देकर खून बहाने का हक दिया जाए 

अपशब्दों को भुलाकर क्षमा किया जाए,

कुरुक्षेत्र की अग्नि में घी डाला जाए _ क्यों ?

यह कैसी अच्छाई है !!!


क्या शकुनी बदल जाएगा 

धृतराष्ट्र की महत्त्वाकांक्षा बदल जाएगी

गांधारी अपनी आँखों की पट्टी खोल देंगी

फिर द्युत क्रीड़ा नहीं होगी

द्रौपदी के चीरहरण के मायने बदल जाएंगे

अभिमन्यु जीवित हो जाएगा ...


इस बेतुकी सीख का अर्थ क्या है ?


अगर सम्मान नहीं है एक दूसरे के लिए 

आँख उठाकर देखने की भी इच्छा नहीं

तो किसी तीसरे की यह सीख

कि भूल जाइए 

क्षमा कर दीजिए 

आप ही बड़प्पन निभा दीजिए... आग में घी ही है !

सूक्ति बोलनेवाले को अपना वर्चस्व दिखाना है

वरना सोचनेवाली बात है

कि कोई महाभारत को भुलाकर 

चलने की सलाह कैसे दे सकता है !


यूँ भी किसी रिश्ते की बुनियाद समझ है,

स्नेह है

सम्मान है ... 

क्षमा के लिए,

कुछ भूलकर चलने के लिए, 

-इसी बुनियाद की जरूरत है ! 


रश्मि प्रभा

17 सितंबर, 2024

अन्याय कब नहीं था ?

 अन्याय कब नहीं था ?

मुंह पर ताले कब नहीं थे ?

हादसों का रुप कब नहीं बदला गया ?!!!

तब तो किसी ने इतना ज्ञान नहीं दिखाया !

और आज 

सिर्फ़ ज्ञान ही ज्ञान दिखा रहे हैं ।

सड़क पर इन ज्ञानियों में से कोई नहीं उतरता है !

ये बस एक बाज़ी खेलते हैं,

सरकार की !!

किसका बेटा,

किसकी बेटी ... इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता इनको !

यह वह समूह है,

जो व्यक्ति विशेष को 

गाली देने के लिए बैठा है ...

उससे ऊपर कुछ है ही नहीं ।


अरे क्या सवाल पूछते हो तुम भी ???

"अपनी बेटी,बहन होती तो ?"

तो क्या ?

क्या कर लेंगे ये ?

ये बस फुफकारेंगे,

वर्ना इनका दिल भी जानता है 

कि इनको कोई फ़र्क नहीं पड़ा था

जब अपनी बहन, बेटी थी ।

इन्हें फ़र्क पड़ा बताने से !

इन्होंने उनको चुप करवा दिया,

और खुद भी 

अपनी अनदेखी इज्ज़त बचाने में 

मूक रहे ।

व्यथा को कभी शब्द दिए ही नहीं,

कभी गले लगाकर अपनी बहन, बेटी से पूछा तक नहीं,

कि तुमने अपने भय पर काबू कैसे किया !!!

उनको बिलखकर रोने की इजाज़त भी नहीं दी !

और मर्म की बात करते हैं !!!...


रश्मि प्रभा

06 सितंबर, 2024

सीख और ज्ञान

 अम्मा ने सिखाई संवेदनशीलता 

रास थमाई कल्पनाओं की

पापा ने कहा,

जीवन‌ में कमल बनना...

इस सीख के आगे कठिन परीक्षा हुई 

अनगिनत हतप्रभ करते व्यवधान आए,

साथ चलते लोगों के बदलते व्यवहार दिखे,

अबोध मन‌ ने प्रश्न उठाया !

यह सब क्यों ?

और कब तक ?

अम्मा ने कहा,

जाने दो,

पापा ने कहा,

उसमें और हममें फ़र्क है ।

हर उम्र,

हर रास्ते पर मैंने इनके शिक्षा मंत्र को 

सुवासित रखना चाहा

पर, इस फ़र्क ने,

इस जाने दो ने 

मन को एक लंबे समय तक रेगिस्तान बना दिया ।

उसी मरु हुए मन ने 

उनको भी गुरु ही मान लिया 

जो इसके विपरीत थे ।

मैंने राक्षसी प्रवृत्ति नहीं अपनाई

पर राक्षसों को जाने नहीं दिया !

अपने और उनके फ़र्क को बरक़रार रखा,

और समय आने पर हुंकार किया ।

मेरे हुंकार की बड़ी चर्चा हुई 

क्योंकि वह सामयिक था,

तब मैंने मौन धारण किया 

और शुष्क दिखाई देने लगी ।

अपनी शुष्कता से मेरे अंदर ही हाहाकार उठा,

बाकी सब तो आलोचक बने ।

मैंने आलोचनाओं के आगे महसूस किया 

कि आज भी मेरी शिक्षा में अम्मा,पापा का आरंभ अमिट है ।

पर मैंने आंधियों से भी ज्ञान लिया,

सूखती गंगा,

धराशायी वृक्षों, 

पहाड़ों के खत्म होते वजूद से सीखा,

गाली के बदले गाली नहीं दी,

लेकिन सुनी गई गालियों को याद रखा,

.... सबकुछ कृष्ण के न्याय पर छोड़ दिया ।

आज मैं जहां हूं,

उनके रथ से ही आई हूं 

और उतना ही किया है,

कहा है,

जितना आदेश उन्होंने दिया है ।

वे कहते हैं,

जाने दो, लेकिन तभी तक

जब तक तुम्हारा धैर्य है ।

कमल बने रहो,

लेकिन यह भी याद रखना 

कि समय के कमल की नियति जल है 

ना कि कीचड़ ।

 

रश्मि प्रभा

27 अगस्त, 2024

कृष्ण

 सोच रही हूं...

कृष्ण के हिस्से,

उनके जीवन में क्या नहीं था !

दहशत भरा अतीत,

वहां से निकलने का रास्ता,

माता पिता से दूर जाने का विकल्प,

घनघोर अंधेरा,

मूसलाधार बारिश,

शेषनाग की सुरक्षा,

यमुना का स्पर्श,

गोकुल की धरती,

मां यशोदा का सामीप्य 

नंदबाबा का घर

बलराम का साथ 

राक्षसी का सामना,

कालिया मर्दन 

माखन, राधा,

गोपिकाएं,

सुदामा,

गोवर्धन 

वृंदावन.... 

मथुरा ।

वियोग, कर्तव्य 

कंस मामा का वध 

उद्धव के ज्ञान को प्रेम तक पहुंचाना,

द्वारकाधीश बनना,

कुरुक्षेत्र में गीता सुनाना,

साम दाम दण्ड भेद -

सबको एक अर्थ देना ।

कपटी' सुनने की क्षमता,

सबकुछ जानते समझते हुए भी 

सही समय की प्रतीक्षा !

.....

रोम रोम अश्रुसिक्त 

उनके जन्मोत्सव के आगे नतमस्तक रहता है,

तभी तो हर बार 

मैं खुद में 

मां देवकी, यशोदा,

यमुना,राधा की गरिमा महसूस करती हूं,

माखन बनकर

उनके द्वारा चुराए जाने का सुख पाती हूं ।

उनकी बांसुरी की तान बनकर

हवाओं में घुल-मिल जाती हूं 

गोवर्धन बनकर 

उनकी हथेली पर होती हूं 

सुदर्शन चक्र बन

उनकी शक्ति में ढल जाती हूं 

इससे अधिक अब मैं और क्या पूजा करुंगी ।



रश्मि प्रभा

18 अगस्त, 2024

आह्वान है

 अभिनय और सत्य !!!

शब्दों और व्यवहार का,

एहसास का 

बहुत बड़ा फ़र्क होता है !

यदि मन-गोमुख से 

गंगा निकलती है 

भावना हरिद्वार

दृष्टि बनारस 

और वाणी कैलाश है 

तो देश के किसी भी कोने से 

जो आवाज़ उठेगी,

वह सिर्फ़ और सिर्फ़

अस्वीकार का इंकलाब होगी ... 

इंकलाब का अर्थ पता है न बंधु !

उसे लाने के लिए 

अन्याय की हवेली की ओर

एक पत्थर ईमान से उछालो 

या अनाचार की भीड़ पर 

विद्रोह की एक लंबी चीख 

अंगद के पांव सी डालो 

कि उसकी प्रतिध्वनियां 

उसे उठकर जाने न दें ... 

कुतुब मीनार की ऊंचाई से

लाल किले की गहराई से चीखो

द्वारका की आरती में

केदारनाथ की छाती में चीखो

अमरनाथ के गह्वर में

वाणगंगा की लहर में चीखो

अस्वीकृति के इस आंदोलन को

हर देहरी का दीप बनाओ 

उसे जलाए रखो ...!

छुट्टी लो,

समतल से पहाड़ों तक 

सागर के किनारों तक 

छुट्टी लेकर जाओ

गेट टुगेदर के लिए नहीं,

शराब की बोतलें खोलने के लिए नहीं,

मौज मस्ती में डोलने के लिए नहीं,

एक आत्मीय गुहार के लिए !

पाक-साफ़ प्रतिकार के लिए !

किसी अमानवीय घटना को 

कबतक दंतकथाओं में ढालोगे ?

अनुमानों के हवनकुंड में 

कबतक घी डालोगे ?

बस एक बार !

दिल पर हाथ रखो,

ज़मीर को जगाओ

पराए दर्द को सहो...

फिर कहो,

तुम्हारी बेटी होती तो..... ???

सारे सबूत मिटा दिए जाते तो ???

क्षत विक्षत बेटी को 

कहानी बनते देखकर 

इस तरह मशहूर होने पर 

खुश हो जाते ? 

ठहाके लगा पाते ? 

शरीर के पोस्टमार्टम के बाद

हर तरफ़ से मिलते

चरित्र के पोस्टमार्टम का ब्योरा 

संदेह के शब्द सुन पाते ?


ईश्वर ना करे ...!

किसी के भी साथ ऐसा हो !

पर जब हो ही जाए !

ऐसी दर्दनाक मौत 

जब मिल ही जाए !!!

देश की इतनी बेबस, 

ऐसी बेकस आज़ादी के क्या मायने !

आज़ादी को आज़ादी करो,

इसके लिए लड़ो,

आक्रोश को रगड़ो,

चिंगारियां फूटने दो ... 

दुष्यंत की आवाज़ आ रही है...

उसे सुनो,

पर्वत सी पीर पिघलने दो

हिमालय से गंगा निकलने दो

अपनी कोशिशों को 

सूरतें बदलने दो 

हर गली, सड़क, गांव, नगर में 

हवा में लहरा के 

लाशों को चलने दो

और मेरे सीने में नहीं तो

उसके सीने में सही ... नहीं !

मेरे, तेरे, इसके, उसके 

हर सीने में आग जलने दो !

बहुत ज़रूरत है इसकी,

बहुत ज़्यादा!

आज यही है तुम्हारी 

वांछनीय योग्यता ! 

लिखते जाओ,

सड़क पर आओ

सारे मंदिर, मस्जिद

गिरजा, गुरुद्वारे बंद कर दो

कोरोना काल की तरह 

यातायात रोक दो 

दुकानों के शटर गिरा दो...


मरना है हर हाल में 

तो आत्मा को जी भर

जीकर मरो...जीकर मरो !


रश्मि प्रभा

घड़ी

  घड़ी सिर्फ़ समय नहीं बताती, वह चेतावनी भी देती है। आंखें दिखाती है, बार-बार, बिना चिल्लाए । मगर हम हैं कि करवट बदल लेते हैं  जैसे समय गलत ...